जिला मुख्यालय में खुलेआम चल रहा अवैध प्लाटिंग का खेल, नियमों की धज्जियां उड़ाकर हो रही रजिस्ट्रियां

जिला मुख्यालय में खुलेआम चल रहा अवैध प्लाटिंग का खेल, नियमों की धज्जियां उड़ाकर हो रही रजिस्ट्रियां
कोरिया। जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर में अवैध प्लाटिंग का कारोबार लगातार बेखौफ तरीके से फल-फूल रहा है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक आदेशों और स्पष्ट नियमों के बावजूद भूमाफिया न केवल अवैध प्लाटिंग कर रहे हैं, बल्कि उनकी रजिस्ट्रियां भी धड़ल्ले से की जा रही हैं। इससे न केवल शासन के आदेशों की अवहेलना हो रही है, बल्कि आम नागरिकों के साथ धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। जानकारी के अनुसार सरगुजा संभागीय आयुक्त के निर्देश पर मई 2025 में जिले में चिन्हित कई अवैध प्लाटिंग वाली भूमियों पर बोर्ड लगाए गए थे। इन बोर्डों के माध्यम से स्पष्ट किया गया था कि संबंधित भूमि पर प्लाटिंग अवैध है और वहां किसी भी प्रकार की खरीद-बिक्री प्रतिबंधित रहेगी। इसी क्रम में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय से उप पंजीयक कार्यालय को अवैध प्लाटिंग की सूची भेजी गई थी, जिसके बाद कुछ समय तक इन भूमियों की रजिस्ट्री पर रोक भी लगाई गई थी।
लेकिन स्थिति तब बदलती नजर आई जब बिलासपुर से स्थानांतरित होकर बैकुण्ठपुर आए उप पंजीयक सुरेन्द्र कुमार के कार्यकाल में फिर से अवैध प्लाटिंग की रजिस्ट्रियां शुरू हो गईं। आरोप है कि बिना किसी वैध अनुमति, ले-आउट स्वीकृति और रेरा (RERA) पंजीयन के अवैध प्लाटों की रजिस्ट्री की जा रही है। इतना ही नहीं, शहर के आसपास के इलाकों और यहां तक कि कलेक्टर कार्यालय के समीप भी खुलेआम अवैध प्लाटिंग का खेल चल रहा है। नियमों के अनुसार, छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 165 एवं 170 के तहत बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के भूमि का विभाजन और विक्रय अवैध है। वहीं नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के अंतर्गत बिना स्वीकृत ले-आउट के प्लाटिंग करना अपराध की श्रेणी में आता है। इसके अलावा रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (RERA) के अनुसार किसी भी आवासीय या व्यावसायिक परियोजना का रेरा पंजीयन अनिवार्य है। बिना रेरा पंजीयन के प्लाट बेचना न केवल अवैध है, बल्कि इसके लिए भारी जुर्माना और कारावास का प्रावधान भी है। इसके बावजूद प्रशासनिक उदासीनता के कारण अवैध प्लाटिंग पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में कानूनी विवाद, अव्यवस्थित शहरी विकास और आम जनता की गाढ़ी कमाई के डूबने जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और उच्च अधिकारी इस मामले में कब तक ठोस कदम उठाते हैं।















